थारु कविता खिचरा

Friday, 6 January 20170 तपाइको प्रतिकिया ब्यक्त गर्नुस

Posted By :- Admin {Hamar Sanesh}


पहिलेपहिले खिचरावाक एक हप्ता एगहिं
मोर बुबा जैय बन सुन्तहुँ पाता टुरे
बहुत दिन यगहिंसे सामा करिय खिचरावाक मोर बुदाव
मछोरीयाक दिनवा खिचरावाक गाउँवाक सब मनसावाह
जाई माछरी मारे  संगही जईय मोरो बुबा
हेर्ते पैंडावा बुबाक बुदाव लगीय चिचर उसीने
सांझा यनली मछरीया बुबाक हंसे उसिनली चिचरावा
बुदावक खाई सब सवाद मान्ते चिचर माछरी मछोरीयाक दिन्हा
सांझाक बन्हली पोकवा पकावेके बेहनही
उठिय मोर बुदाव घौरा करे
जम्मे जना छोटे जवणे बेहनाहि लगई लदियामा
लहाए पोकवा खाएके यागा
सुन्तहुं नाहि लहैले दोसरि जन्मावामा बनेक डरे ढेङफरवा ईंचा
जसने मनोलीय मोर बुबा हँ ओसने मनोलीय बाबा
बाकि ईचिका याजुकालु मोइ परिवर्तन भेल बणहिं
जसने परिवर्तन भेलीय ई जमाना
छोड देलहुँ पोका बान्हेके बहुतजना
बनोबो करले मत्रे कुन्हु कुन्हु बारीयाक केरवाक पातवा काटके
बिसरोलहुँ याजुकालु मछुवारी करेके
जोगटोन मात्रे पुगोसहुँ पोखरीयाक मछरीयासे  मछोरियाक दिन्हा ।
बेहनाही लहाएके खिचरावाक दिनवा नाहि उठतई देउता कहते
रसेरसे छोडई बणहुँ  ।
यसनुक हालत मोर पालामा झन कसनुक हतई मोर छोकनावानी पालामा
डर लगसिहे ,चिन्ता लगसिहे हमार यी संस्कृती 
हमार यी चिनारी कतहुँ एकादेशक काथामा त
नाहि सिमीत हखबिय  । ।

Sunil Mahato
Madi -4 Sidhuwa
Chitwan

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