लेखक:=- थारु युवा साहित्यकार सुरेश चौधरी मोरङ।
कविता ,,
हास्वहै कि कान्वहै,
जब बिततु तब जान्वहै,
कुन बगन हेलिस गाउँ समाज के रित
सवकै मने मने कर्छी बिना सुर ताल के गीत,
गुनगुनावे मन लाग्छी थारु भासाके गीत,
बनावे मन लाग्छी एखात रा जनचेतना के गीत,
दैय बहिन के देख्छिन खाली छि सिथ,
बाप भ्या सव हदियछी देखिके समाज के इख,
कर कुटुम एछी माङ्ग्छी दानदहेज बेसि,
कखरु कखरु त सुख्ना पान घुरयाके देछी ठेसि,
थारु समाज के एहयाना नै बनिहा छेकी रित,
कखरु छि त कखरु नैय छि किनेके हेति ठिक,
बेटी हो बच्चाके सम्मान हक दिलावम तवेहेति ठिक
थारु समाजमे जनचेतना दिलावम मत छिटम बिख,
माङ्गी चाङ्गी के कोइ भोरछे आपन बेटी के सिथ,
भ्याबाप के ऋणदाताके ऋण तिर्ते हेछे जिन्गी ठिक,
थारु वे खवास समाज के छेके नै असल इना रीत ,
एहयाना समाजके कुरिती बिकृतीसे ख्यालेछी बिख
हमर परिचय कहवहै त ग्रामथान गाउँपालिका १
मोरङ सुरेश चौधरी खुनियाँकटा थानटोल गाम,
एहिनेङे एहिनेङे समाज सुधारकसव सनेश लिखिके
विवेकशील थारु युवा समूह संस्थाके जनम देनि नाम।
