ऐसिन थारू जात(थारु भाषाक कविता)

Tuesday, 25 April 20170 तपाइको प्रतिकिया ब्यक्त गर्नुस

Posted By :- Admin {Hamar Sanesh}

रंग बदली  समय समय रंग बदलल।
दल दलमे फसल थारू दल।।
उठके थारू जनतान उठाईथ की।
डुबके  थारू पहिचान डुबाईथ।।
.....
देश धकेल्ता की द्वन्द ओर धिरे धिरे।
देश चलुईया फे छुट्थै कबु जुट्थै।।
सोझ जनता हेरेक भर हेरथै।
नबुझैना नाही बुझ्न कोसिक कर्ना।।
......
अपन स्वार्थके लग जनता मर्न।
लरो जनता लराकुनसे नेता भग्न।।
हाथेम मुन्टम बधल पाटीक पट्टी।
हर चुनाउम थारू बातै हट्टी।।
......
जुट्ही कब सक्कु थारू जनता ।
ओड्रम मुस डबलेक डबल आतै।।
दौरतै आजकल गाउमे दारू लैके।
धेला भुर्राईता चलो प्रचारमे हर धैके।।
.......
जाउ जिताउ थारूनेके जीत हुई।
हितल थारू हे ओहे मतसे कत्रा हिट हुईत।।
मौका चुकजाई उठे नाई पैबो चुपाईल रहो हो।
हाँसो आजिक दिन काल्ह हाँसे नाई पैबो।।
......
जे थारू अगुवा ओहे ठगुवा।
पाछे पाछे कर्न नेतानके पिछ लगुवा।।
चिन्हो कबो चिन्हके फे का कर्बो।
मार पाके मरजीबो उलितके नाई मर्बो।।
......
घरके बाघ बनके बिलार जस्ते।
मत नबेचो मत्वारमे ओस्ते।।
खुद लुट्तो थारू गाउँ लुटाईतो।
अन्धारमे बैठले जिन्गी बिताईतो।।

               लेखक:=असिराम डंगौरा

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