🌹🌹थारु गजल ,,🌹🌹
कत्रा लुटैली धन सम्पत्ति कत्रा सट्ली दारुक बोतल से
कैसिन रहे हमार समाज सक्कु लुटैली दारुक बोतल से
कमैया हुईली अफ्ने कार्ण से पढल लेखल नै हुके हम्रे
लगैली लेप्चा लाल्च से हम्रे लुट्गिली दारुक बोतल से
कहाँ गैल रिति रिवाज कहाँ गैल हमार संस्कृति
भुलगैली दशैं,माघ मानेक नै पैली हम्रे जारेक बोतल से
उठब अब हम्रे एक जुट हुके बहुत हुईगिल अत्याचार
भुलादेब अब दारु,जाँर गलती हुईल दारुक बोतल से।
( लेखक:- प्रमोद जंग चौधरी )
