थारु समुदायमे बाल पर्व गुरही –छविलाला कोपिला

Friday, 28 July 20170 तपाइको प्रतिकिया ब्यक्त गर्नुस

Posted By :- Admin {Hamar Sanesh}


संस्कृति हरेक समुदायके आपन मौलिक पहिचान हो । उहेसे संस्कृति संरक्षण ओ सम्बद्र्धनके लग सक्कुहस् समुदायक मनै कौनो नकौनो रुपमे जुटल् रठाँ । थारु समुदायमे फेन अइसिन धेर संस्कृति बा, धेर ट्यूहार बा । सावन महिना ट्यूहारके शुरु हुइना दिन, उहेसे सावन लग्टीकिल ट्यूहार अइना शुरु हुजाइठ् । सवनियाँ ओराइल् कुछ दिन पर्से गुरही ट्यूहार आइठ्  । असार ओराइ ते सवनियाँ आइठ् । थारु जात खेती किसानी कैना जात हुइलक ओरसे यदि असारमे खेती ओरागैल कलेसे  सवनियाँमे हर्डहवा फेन हुइसेकठ् । यदि नै हुइल कलेसे गुरहीमे धेरहस् गाउँमे हर्दहवा बनठ् । हर्दहवा धेरहस् गुरहीक दिन मन्लाँ डेउखरमे मुले दाङमेभर अकाशे खेती हुइना हुइलक ओरसे हुई हर्डहवा ठनिक पाछे मान्ठाँ । जा हुइलेसे फेन हम्रे थारु समुदायमे  गुरहीक बारेमे कुछ जानकारी कराइ जाइटुँ ।
बाल पर्व गुरही सावन महिनक् अँधरियामे पञ्चमिक दिन परठ् । जौन हिन्दू लोगनके नाग पञ्चमीम दिन परठ् । उहसे बहुट मनै गुरही ओ नाग पञ्चमी अक्के हो कना भ्रममे रठाँ । लकिन यी दुनु पर्व के विधि प्रकृया ओ मान्यता अलग अलग बटिस् । उहेसे आई यी ट्यूहार काकरे मन्ठी टे हम्रे थारु ? धेर जनहुनहे पटा नै हुई सेकठ् । यी ट्यूहार विशेष कैके थारु जात प्रकृति पुजक जात, प्रकृति प्रतिविश्वास कैना जात । उहेसे आउर चाजके पूजा करेहस् थारु गुरहीमे किरा काटिनके पूजा कैठाँ । गुरही कना एक मेरके उर्नहाँ किरा हुइट् । ऊ किरा खास कैके मास–मच्छरहे काटके खैटठाँ । असिकके खैलेसे रोग नै लागे पाइठ् ओ हम्रे खेती–पाती कैना जात हुइलक् ओरसे असार महिनामे खेतवम् काम करेबेर हिला किचा जरुर लागठ् । हमार शरीरमे हिला लग्लेसे बहुट् मेरिक खटरा, खुँज्ली, लगाके मेर–मेरिक रोग फेन लागठ् । यिहे रोग विरोगहे गौर्हीपर लैजाके अस्रैले बरस दिन मनैनमे रोग कम लागठ् कना जनविश्वास बा । उहेसे यी दिन आपन घरसे रोग –विरोख निकारके गौर्हीपर अस्राइ जैना चलन बा ।
यी ट्यूहार कैसिक मन्ठी टे ? आब आई यकर बारेम् कुछ जानकारी लि । अँधरियक चौठिक् साझ चौकीदरवा गाउँमे हाँक पारठ् । ‘घुघरी भिजाउ रे घुघरी भिजाऊ’ कैह्के । गाउँमे साँही जुन चानक घुघरी (कोहरी, चानक एक विशेष प्रकारके परिकार) भिजैठाँ । दोसर दिन पञ्चमिक दिन साँझके ऊ घुघुरी खोब मिठके निँध्ठाँ ।
जब दिन बुरे–बुरे करे लागि टब्बे फेन चकिदरवा फेन हाँक पारठ । ‘गुरही अस्राई चालो रे, गुरही खस्राई ।’ यहोँर गाउँक सक्कुहस घरक छोट–छोट लवन्डिन चिर्कुटिक् गुरही बनैले रठाँ ओ लवन्डन जुन सोँटा । सोँटा रारक कौनो एक्के टे कौनो दुई फुल्रक बनैले रठाँ । जब अस्राई जैना हुइहिन टे लवन्डिन लावा–लावा लुगरा पहिरके टठियामे चानक कोंह्री (घुघरी) चाना नै रह्लेसे केराउ या कौनो दाल बालीसे बनल् कोंह्री ओ गुरही लेके गाउँक गौर्हीपर जैठाँ ।
चकिडरवक् हाँकसंगे जब घर–घरसे टठियम् गुरही ओ घुघरी लेके निकरठाँ । यहाँेर जस्टक गुरही अस्रुइयन निकर्हीं ओस्टक गाउँक जन्नी बिशेषतः भन्सहरिन टठिया या सुप्पा ठठैटी (बजैटी) ‘खाँज खुजली, रोग बिरोख सक्कु लैजा कह्टी भित्तरसे चरुवापर (डगरसम्म) छोरके चल्अइठाँ । ओत्रकिल नै गुरहीमे गैन गीत ‘दाङ बोले टिम्की महदेवा बोले ढोल, आमलिक रुखवातिर.. गुरही । फेन बरा मेह्रावनके गैठाँ । अस्रुइयन निकरल् करठाँ ।
जब गौर्हीपर सक्कु जाने जुट्ठाँ । तब गाउँक पन्हेरवन सोँटा लेके गैलक् लवन्डनहे पत्निक पटानके लाइन लगाके ठर्हुवैठाँ । तब लवन्डिनहे गुरही बगाई कैह्के उहीहे ठठाई कठाँ । सोँटा लेके ठर्हियाल् लर्का बगाइल् गुरही ठठैठाँ । ‘दे घुघरी, दे घुघरी’ कह्टी । एक घचिक ठठैठाँ ओ सोँटा बगाके टठियामे लैगैल कोह्री मग्ठाँ ।
लवन्डिन आपन सेकट सक्हुनहे बँटठाँ ओ बँचल् घुघरी गाउँ रजावर मर्वापर लैजाके छिट्ठाँ ओ घरक् छँपरापर लैजाके फेन छिट्ठाँ । घरेक डेहरीमे धैल अनाजमे धैलेसे अनाज बर्हठ् । बारीमे लगाइल् टिना टावनमे छिट्ठाँ । टिना टावनमे छिट्ले टिना फरठ्, नै लज्¥याइठ्, छुट नै मानठ कना विश्वास बा । ओत्राकिल नै अइसिक कैलेसे बरस भरिक रोग बिरोग, घरेमे भूत–प्रेत नै अइना ओस्क खाँज खुजलीसे बँच्जाइठ् कना विश्वास कैठाँ ।
ओस्टक नन्हें जौन लवन्डन ठठैलक सोँटा नुक्वाके घरे नान्के बारीमे लगाइल् टिना टावनमे धैलेसे टिना टावन जोरसे फरठ् ओ उहीहे धुपाके या घोटके लगैलेसे धेरहस् खतरा, पेट बत्ठी, जुरीमे फेन लागठ् कना विश्वास फेन अभिन थारु समुदायम बा । असिके यी ट्यूहार रोग–विरोग भगैना ट्यूहारके रुपमे मान्जाइठ् ।

साभार ः हमार संस्कृति

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