गजल,,
सावनमे खै काहे खुब घल्लो हरियार चुरिया बाबु।।
मनैना लाज लागथ थारू टिहुवार गुरिया बाबु।।
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अईती बा भदौम गैरथारू नारीनके तीज दौरल।
सारीम नच्बो कैहके मै गोला सुर-सुरिया बाबु।।
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महिन टे मोर गाउँ बचपनके यादे मजा लागथ।
संघरियान संग खेलल बनाके घुर-घुरिया बाबु।।
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अब हमार थारूनके टर टिहुवार छोर्ती जाईतो काहे?
नभुलैहो हमार पूजा हरेरी,लवाङगी धुरिया बाबु।।
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लेखक:=असिराम डंगौरा
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सावनमे खै काहे खुब घल्लो हरियार चुरिया बाबु
