" थारु भाषामा मुक्तक साउन बिशेष "
मनसे देखबही तब करिया बडिहे हसे लुरी। साउन परलई रे अब त. चाहे भर हाथ चुरी। जथि जथि मन लगतई उहे किनसी तुई उहाँ, तोर मरदावा बिदेशमा करई बडिहे मजदुरी।
-नबिने चौधरी (चितवन)
| Home | About | Blogs | Contact | RSS*