कविता,,
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थर्कथ बद्री जिउ थरथराईथ
बार्ह आके कहा बेझ लगाईथ।।
भदौहा झापस भरल बर्खा
चम्कल बद्री धर्का धर्का।।
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घुघ्घु सुस्सु अन्धार करिया
भुईयाँ छुए रूखुवाक दरिया।।
चपाकसे जुर लग्ना चुवाल पानी
मसनसे बच्ना फाटल मस्दानी।।
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बन्वा विनाश हुईल
घन घोर हुईल बस्ती।।
सपनामे सखाप सम्पत्ति
जिन्गी जिए परल जबरजस्ती।।
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सम्हरल समाज की बिग्रल
गोर तानिक तानम सिक्रल।।
सजाई नि सेकगील सरियाक महल
खतराम परल खरियाक महल।।
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चम चम चम्कथ बद्री
झमक से झमकथ आँखी।।
तप टुप चुनाहा छपरा
फुटल फोङ परल खपरा।।
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जमानैक जोरल बुदूक सम्पत्ति
बर्हाई नि सेकके परल बिपत्ति।।
छलकल लदिया छटपताई जिउ
छट्री ओर्हके छपराम बैथ लिउ।।
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भठल सब कुलुवा तलुवा
बार्हसे गाउँ बनल जल जलुवा।।
भस्कल घरेम भन्साम देहरी
काल आईल कैसिक खैबो कलुवा।।
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बिगारो नाई बलगर बनाउ
जानो ओ जनचेतना जगाउ।।
रूखुवा लगाई गाउँक झरन झारी
नाई बहि बार्हसे हमार घर घारी।।
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लेखक:=असिराम डंगौरा
