अक्के मेरके समय नै रहठ कबु जार टे कबु घाम,
टबेमारे हुई एकर करबो कबु नाम टे कबु बडनाम !
जब बिहान हुइठ ओ निस्चिट बा साँझ्या जरुर हुइ,
जान बुझके फे जो ओजरार खोज्ना नैमजा काम !
गजबके बा ई सँसार ई डुनिया बुझ्न कठिन कबु टे,
अँग्री उहिन मनो टिन अँग्री महिन नै बुझ्ना टमाम !
रुपिया पैसा ढन्डौलटके पाछे आखिर कहाँ सम टे,
कबु टे लागठ इहे सब्ठोक हो डेख्के मनैन्के जाम !
मै भारी टैं छोट अपनही आपन बयान करलेसे फे,
बानी व्यबहार मजा इहिसे भारी कोइ नै हो चाम !
एच एम चौधरी
कैलारी ४, कैलाली ।
