पढल लिखलके आगे बढलजाय (बिचार/लिङ्क खोलेर पढ्नुहोला)

Thursday, 1 March 20180 तपाइको प्रतिकिया ब्यक्त गर्नुस

Posted By :- Admin {Hamar Sanesh}

हमार सनेश सहकर्मी,,
लेखक :-श्याम सि.टीं,,
पढाई एक बहुत महत्वपूर्ण चीज हो जौन कि कौनो भी ब्यक्ति समुदाय,समाज हो ब्यक्ति हो ओके आगे बढेक खर्तिन पढाईके बहुते जरुरी रहत । जे पढ लिखेक ज्ञान हासिल कइलेबा उ ब्यक्ति बहुत आगे जा सेकत । बकिन जे पढेक लिखेक नाई पइलेबा वा पढले लिखले नाई बा ते ओके आगे बढेक लिए साथे आउर जनेक आगे बढाएक बहुत कठिन पडी । यदि उ पढले लिखलेबा ते ओकर आसान हो सेकी ।

थारु समुदायमे बहुत पहिलेसे पढाईसे बन्चित कइगइल रहे वा ओन्हरे चेतनाके कमीके कारण पढ लिख नाई पइलन जेकर कारण अभिन भी हमरे पाछे बाटी । पहिले ई सिखागइल कि पढले लिखले कौने काम,हर जोतले धाने धान कहिके सिखा गइल जेकर कारण भी धेर जने नाई पढलन लिखलन तेकर असर अभिन भी पडलबा । उहेक नाते आइलजाय अब उ रेकर्डके टुरके आगे बढेक पडल आउर ज्यादा से ज्यादा पढेक लिखेक पडल आउर आपन लइकन पढाएक लिखाएक पडल ।
पढनो एक कला हो । यी कला बतात कि हम कइसे पढी कि  विषयक सही समझमे आए औ एके हम ठीक–ठीक ढंगसे अभिब्यक्त एवं प्रतिपादित कइ सकी । स्कुलिहा लइका पढलन ते वोकहन विषयके समझेक चाँही एवं मास्टर पढलन ते वोकहन बढिया मेरसे अभिब्यक्त करेक आएक चाँही, वकिन पढेक ते दुनहुनके परत । एकके अपन परिक्षक खर्तिन पढेक परत औ दुसरके वोके समझाएक खर्तिन । यीहो आवश्यक बा कि पढाइमे रुची होएक परल, जेकेसे पढेक काम नियमित रुपसे चलते रहे । रुची तब पैदा होइ, जब विषयके उद्देश्य एवं औचित्यके ज्ञान होइ ।
रुची लइके पढेक तब्बे संभव होइ पाइ, जब हम्मन उ विषयके उद्देश्यके पता होइ कि आखिर हमरे वोके काकरे पढत बाटी औ उ विषयक हम्मन जीवनसे का संबन्ध बा ? जबतक यी बात स्पष्ट नाइ होय पाइ कि विषयक औचित्य का हो औ वोके हमरे निजि जीवनमे का उपयोगिता एवं आवश्यकता बा, तबतक विषय गदहक पीठपर चन्दनके लकडी बोकेक समान बोझा भर प्रतित होत । गदहा चन्दनके बोकत ते रहत, बकिन उ वोकर महत्व औ सुगन्धसे बञ्चित बनल रहत । ठीक यिहेमेर हमरे भी विषयक बोकत रहली, वकिन हम्मन पता नाइ रहत कि जउन कक्षामे हमरे पढली, वोकर पाठ्यक्रम का हो औ काकरे बा ? कुलिए एक बोझा हस, रुचीहीन मालुम पडत, बकिन ठीक एकर उल्टा जब हम्मन विषयक लाभ एवं उपयोगितक जानकारी होइजात ते रुची स्वतः पैदा होइ जात औ हम्मन मन पढेमे रमाए लागत ।

पढेक लिए हम्मन अपन क्षमतक अनुभव होएक चाँही । यी क्षमता – (१) आंतरिक क्षमता, (२) सीखेक क्षमता, (३) अभिब्यक्त करेक क्षमता, (४) स्मरण शक्ति । आंतरिक क्षमता अंतर्गत हम्मन समझ केतना बा, यी आत । एहमे यी देखेक बात बा कि हमार क्षमता एतना बा कि हम एके निबाह कइ लेब वोके समझ लेब । यदि हमार क्षमता यी नाइ बा कि हम गणितके समझ सकब ते यी विषय हम्मे कब्बो समझ नाइ आइ, काहेसे कि एकर लिए हम्मे जेतना मानसिक उर्जा एहमे लगाएक पडी, वोतना हम नाइ लगा सकब । यदि हम एहमे अपन मानसिक उर्जा नाइ लगाब ते यी हमार मुरीक उप्परसे निकर जाइ । हम गणितके किताब लइके बइठल रहब, बकिन कुछ नाइ जानब । मास्टर पढाके चल जइही, बकिन हम अपनही मनेम सोचते रही जाब औ कुछ नाइ समझमे आइ ।
विषयक सम्झना मेर बनाएक खर्तिन आवश्यक बा कि हमार मनःस्थिति उ विषयक साथ सम्बन्धित होइ जाए । जइसे यी सम्बन्ध शुत्र जुडे लागत ते विषयक समझ जन्मे लागत । फिर हम हर विषयक गहिराइक साथ–साथ वोके विस्तार एवं ब्यापकतक जाने  लागब औ एकर साथे हम एक विषयके अन्य विषयक साथ जोडके देखे सकब तथा उ अपन जीवनमे केतना उपयोगी एवं आवश्यक बा, यिहो समझ सकब । जब यी समझ पैदा होइ जाइ ते हमार सीखेक क्षमता भी विकसित होइ जाइ एकर बाद हम उ विषयक आउर गहिराइसे सीखेक प्रयास करब ।
सीखेक क्षमता विकसित होइ गइलेपर हम अपरिचित विषयक साथ भी गहीर तारताम्य जोड सकब । यी कला आ गइलेपर हम तमान नया विषयक साथ संबन्धित कइके समझे लागब औ तुलना करे सकब । एकेसे हमार वौद्धिक विकास होत । विषयके मूल वस्तु एवं मुख्य विन्दुक ज्ञान होइ गइलेसे उ विषयक सम्झेक औ सिखेमे ढेर सहजे होइ जात । यी मेर हम उ विषयक ढेर बढियासे निवाह करे सकब । फिर वोके याद करेमे आवश्यता नाइ परी । याद ते तब करेक परत, जब हम्मन विषयमे समझ नाइ आत । समझमे आ जाइ ते विषय स्वतः स्मृतिपटल पर अंकित होइ जात । यिहेक खर्तिन उपनिषद कहत कि विषयक ढेर समझ पैदा करो, वोके याद न करो ।
समान्य रुपसे स्कुलिहा लइका अपन विषयक तमान मेरसे याद करलन औ अपन दिमाकमे वोके संबन्धित आँकडासे ठुँसे– भरे लागलन । एक प्रश्न याद करही, फिर दुसरा, फिर तिसरा यिहेमेर ढेर प्रश्न दिमाकमे भर लेलन । दिमाक प्रश्नके खजाना बन जात, बकिन परीक्षक समय यदि कौनो प्रश्नके उत्तर याद नाइ आइल औ एकर परिणाम स्वरुप तनाव पैदा होइ गइल ते फिर स्थिति एतना विपन्न एवं भिषण होइजात कि बता नाइ सेक मिली । अइसनमे हम्मन दिमाक खिचडी बन जात औ प्रश्नके गल्ति उत्तर आए लागत ।

दिमाकके एक निश्चित खास बनावट एवं बुनावट होत । कौनो चीजके कइसे याद कइलजाए, वोकर खर्तिन वोके उ बुनावटके साथे तारताम्य राखेक परत । यी तारताम्यमे तब ब्यतिक्रम आत, जब भावनात्मक असंतुलनके स्थिति पैदा होत । भावनात्मक स्थिरतामे स्मरणशक्ति अपन चरम सीमापर होत, वकिन अस्थिर अवस्थामे यी ढेर खतरनाक एवं हानीकारक होत । अइसन स्थितिम सोच, समझ, स्मृति एवं अभिब्यक्ति क्षमता तहस–नहस होइजात औ भारी क्षति होइजात, कुछ याद नाइ रहत, सबकुछ क्षत–विक्षत खण्डहरमे परिवर्तित होइजात । सारा मेहनत, उर्जा, समयक फिर कौनो मुल्य नाइ रहिजात । अतः हम्मन भावनात्मक संबन्धके स्थिर बनइले रहेक चाँही, ताकि हम्मन उर्जा, श्रम एवं समय विषयवस्तुक समझ पैदा करेमे नियुक्त होइ सकी ।
विषयके समझ होइ औ वोहमे रुची पैदा होइ जाए ते वोकर अभिब्यक्ति होइ सकी । यी सन्दर्भमे पढोइया लइका विषयक बढिया ढंगसे प्रस्तुत कइ सकही औ मास्टर वोके प्रतिपादित कइ सकही, अभिब्यक्त कइ सकही । यी मेर पढलेमे रुची उत्पन्न होत औ हम ढेर नया विषयक प्रति आकर्षित होली एवं वोके पढेक मन लागत । पढना एक कला हो । वोकर शुरुवात हमे वहासे करेक चाँही, जहा वोकर मूल विषय समाइल रहत, जेके खुललेसे सबकुछ खुले लागत । यी मेर हम समान्य पढाइक रुची बनइते स्वाध्यायके क्षेत्रमे प्रवेश करली, जहाँ हम्मन आंतरिक विकासके सम्भावना खुलजात ।
समय बहुत बदल गइलबा,समयके साथ साथे हमरे अब भी नाई चल पाबखोई ते हम्मन आउर दुःख आउर समस्या झेलेक पडी । उहेक नाते अपने आपन आपन जगहीसे आउर जनेक भी प्रेरणा देहेक आवश्यक रहलबा । आउर समाजके,समुदायके,ब्यक्तिके सचेत आउर सभ्य बनाएक बहुत आवश्यक रहलबा ।

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